एनजीओ क्षेत्र की बड़ी चुनौती: 2025 में सामाजिक संगठनों के सामने खड़े हैं ये सात प्रमुख संकट

विशेष रिपोर्ट | मानव कल्याण संस्थान, गोरखपुर द्वारा प्रस्तुत

गोरखपुर,

30 मई 2025:

समाज सेवा और विकास के क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) समाज की रीढ़ माने जाते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार और ग्रामीण विकास जैसे मुद्दों पर इनकी सक्रिय भागीदारी वर्षों से जारी है। परंतु 2025 में जब दुनिया तकनीकी, प्रशासनिक और आर्थिक बदलावों से गुजर रही है, ऐसे समय में एनजीओ सेक्टर भी कई बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है।

मानव कल्याण संस्थान, गोरखपुर द्वारा प्रस्तुत यह विशेष रिपोर्ट वर्तमान समय में एनजीओ के सामने खड़ी मुख्य समस्याओं की पड़ताल करती है।

1-वित्तीय संकट और फंडिंग की चुनौतियाँ  वर्तमान समय में एनजीओ को सबसे बड़ी परेशानी स्थायी फंडिंग की है। CSR कंपनियाँ अब केवल बड़ी और ब्रांडेड संस्थाओं को तरजीह देती हैं, जिससे छोटे और क्षेत्रीय एनजीओ पीछे छूट जाते हैं। FCRA नियमों के कड़े प्रावधानों ने विदेशी फंडिंग को भी काफी सीमित कर दिया है  “स्थायी फंडिंग के बिना योजना तो बनती है, लेकिन ज़मीन पर उतारना मुश्किल होता है।”

2- सरकारी नियमों की जटिलता- एनजीओ को आज NITI Aayog पोर्टल, CSR-1, FCRA, NGO-DARPAN, और आयकर विभाग के तमाम रजिस्ट्रेशन व दस्तावेजों को अपडेट रखना होता है। प्रक्रियाएं जटिल हैं और अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों की संस्थाओं के लिए यह एक बड़ी बाधा बनती हैं।

3. भरोसे की कमी और छवि पर संकट- बीते वर्षों में कुछ फर्जी एनजीओ की वजह से पूरे सेक्टर की छवि प्रभावित हुई है। जनता, मीडिया और यहां तक कि डोनर संस्थाएं भी कभी-कभी संदेह की दृष्टि से देखती हैं।

पारदर्शिता और प्रभावी रिपोर्टिंग की मांग लगातार बढ़ रही है।

4. योग्य टीम और मानव संसाधन की कमी- एनजीओ सेक्टर में पेशेवर और प्रशिक्षित लोगों की भारी कमी है।

 कई युवा समाज सेवा से जुड़ना चाहते हैं, लेकिन करियर विकल्प न होने की वजह से लंबे समय तक टिक नहीं पाते।

5. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पिछड़ापन- आज के युग में वेबसाइट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन रिपोर्टिंग और डिजिटल फंडरेजिंग अनिवार्य हो गया है।

 लेकिन कई एनजीओ डिजिटल संसाधनों या दक्षता की कमी से पिछड़ रहे हैं।

6. कार्य के प्रभाव को मापने की दिक्कत- सरकारी एजेंसियां और CSR कंपनियां अब एनजीओ से “इम्पैक्ट रिपोर्ट” की मांग करती हैं – यानी कि आपके काम का समाज पर क्या असर पड़ा।  परंतु ज़मीनी संगठनों के पास इसे मापने की स्पष्ट प्रणाली नहीं होती।

7. समुदाय की सहभागिता की कमी-  कई बार एनजीओ केवल ‘लाभार्थी’ पर ध्यान देते हैं, ‘सहयोगी’ या ‘भागीदार’ के रूप में समुदाय को नहीं जोड़ते।  इस कारण प्रोजेक्ट के खत्म होते ही उसका असर भी धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।

क्या है समाधान की दिशा?

मानव कल्याण संस्थान का मानना है कि इन चुनौतियों को अवसर में बदला जा सकता है यदि एनजीओ निम्नलिखित बिंदुओं पर कार्य करें:

स्थानीय दानदाता नेटवर्क बनाएं और मासिक योगदान योजना शुरू करें। डिजिटल साक्षरता बढ़ाएं और युवाओं को जोड़ें।  पारदर्शिता और विश्वसनीयता के लिए वेबसाइट, सोशल मीडिया और रिपोर्टिंग पर ध्यान दें।

इंटर्नशिप और वॉलंटियर प्रोग्राम को पेशेवर रूप दें।

एनजीओ के लिए 2025 परिवर्तन और चुनौती का वर्ष है। यदि वे स्वयं को अपडेट रखें, पारदर्शी बनें और समुदाय से वास्तविक जुड़ाव बनाएं, तो वे आने वाले समय में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं।  “सच्ची समाज सेवा सिर्फ सेवा नहीं, एक सतत और जवाबदेह प्रक्रिया है।”

निष्कर्ष:

यह रिपोर्ट मानव कल्याण संस्थान, गोरखपुर द्वारा प्रस्तुत की गई है। संस्था बाल अधिकार, महिला विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में सक्रिय रूप से कार्य कर रही है।

Closeup shot of a group of businesspeople holding a plant growing out of soil

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